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पहाड़ों की रानी में मसूरी विंटरलाइन कार्निवाल शुरू, लोक संस्कृति के समागम में झूमे सैलानी

पहाड़ों की रानी मसूरी में बुधवार को लोक संस्कृति का समागम दिखाई दिया। शहर में निकली भव्य शोभायात्रा, हेलीकाप्टर से होती पुष्प वर्षा, पहाड़ के लोक संगीत और नृत्य के अद्भुत नजारे को देख स्थानीय लोग ही नहीं अपितु यहां पहुंचे पर्यटक भी खुद को नहीं रोक पाए।

हर कोई लोग रंग में रंगता नजर आया। मौका था मसूरी विंटरलाइन कार्निवाल के शुभारंभ का। छह दिवसीय इस आयोजन के पहले दिन शहर में सांस्कृतिक शोभायात्रा निकाली गई। इस दौरान इंद्रमणि बडोनी की जीवनी पर आधारित डाक्यूमेंट्री का प्रदर्शन भी किया गया। साथ ही वीर माधो सिंह भंडारी पर आधारित नाटक का मंचन किया गया।शोभायात्रा लंढौर स्थित सर्वे मैदान से शुरू हुई। पालिकाध्यक्ष मीरा सकलानी और एसडीएम राहुल आनंद ने शोभायात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। शोभायात्रा लंढौर बाजार, घंटाघर, अपर मालरोड, कुलड़ी बाजार और मालरोड होते हुए गांधी चौक पहुंची।

गांधी चौक में स्थानीय विधायक एवं कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने फीता काटकर और गुब्बारे उड़ाकर कार्निवाल का विधिवत उद्घाटन किया।

इस दौरान आइटीबीपी और सीआरपीएफ बैंड की प्रस्तुति ने समारोह में चार चांद लगाए। स्वजन शिक्षा समिति घाटी की ओर से लोकनृत्य की प्रस्तुति भी दी गई।

एसडीएम राहुल आनंद ने कहा कि छह दिनों तक भव्य तरीके से कार्निवाल मनाया जाएगा। कोतवाल दवेंद्र चौहान ने बताया कि कोई ट्रेफिक प्लान लागू नहीं किया गया। मालरोड पर वाहनों का प्रवेश बंद रहा। इससे स्थानीय लोगों और पर्यटकों ने राहत महसूस की।

शोभायात्रा में इनकी रही भागीदारी

शोभायात्रा में विभिन्न सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठनों से जुड़ीं महिलाएं और मसूरी गर्ल्स इंटर कालेज, सनातन धर्म गर्ल्स इंटर, कालेज और, आरएनबी इंटर कालेज के छात्र-छात्राएं शामिल रहे। हालांकि पिछले वर्षों की तुलना में शोभायात्रा में लोगों की संख्या कम रही। इसकी वजह प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच तालमेल की कमी बताया जा रहा है।

ऐसे हुई विंटरलाइन कार्निवाल की शुरुआत

मंत्री गणेश जोशी ने कहा कि वर्ष 2013 में उत्तराखंड में आई आपदा के बाद मसूरी का व्यवसाय ठप हो गया था, जिसे पुनर्जीवित करने के लिए विंटरलाइन कार्निवाल की शुरुआत की गई। इस आयोजन के बाद से मसूरी की अर्थव्यवस्था में सुधार आया।

उन्होंने यह भी कहा कि इस बार कार्निवाल का पहला दिन उत्तराखंड के गांधी इंद्रमणि बडोनी को समर्पित किया गया है, जबकि दूसरे दिन का समर्पण पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम है। हर दिन किसी न किसी महान व्यक्ति को समर्पित किया जाएगा।

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